Sunday, April 22, 2007

नासदासीन्नोसदासीत्तदानीम् नासीद्रजो नो व्योमापरो यत् |
किमावरीवः कुहकस्यशर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरं ||१||

then even nothingness was not, nor existence,
there was no air then, nor the heavens beyond it.
what covered it? where was it? in whose keeping
was there then cosmic water, in depths unfathomed?

सृष्टि से पहले सत्य नहीं था असत्य भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ किस ने ढका था
उस पल तो अगम अटल जल भी कहाँ था
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न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्याऽअहन्ऽआसीत्प्रकेतः |
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धन्नयापरः किञ्चनास ||२||

then there was neither death nor immortality
nor was there then the torch of night and day.
the One breathed windlessly and self-sustaining.
there was that One then, and there was no other.

वह था हिरण्यगर्भसृष्टि से पहले विद्यमान
वही तो था रे भूतजात का स्वामी महान
जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर
ऍसे किस देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर
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तमऽआसीत्तमसा गूह्ऴमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वमांऽइदं |
तुच्छ्योनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं ||३||

at first there was only darkness wrapped in darkness,
and this was only unillumined water.
that One which came to be enclosed in nothing,
arose at last, born of the power of heat.

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कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् |
सतोबन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मानीषा ||४||

in the begining desire decended on it -
that was the primal seed, born of the mind.
the sages who have searched their hearts with wisdom
know that which is kin to that which is not.

गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगाध्देवोकाहेकमेव प्राण बन कर
ऍसे किस देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर

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तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी ३ दुपरिस्विदासी ३ त् |
रेतोधाऽआसन्महिमानऽआसन्त्स्वधाऽअवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ||५||

And they have sretched their cord across the void,
and know what was above and what below.
seminal powers made fertile mighty forces.
below was strength, and over it was impulse.

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कोऽअद्धा वेद कऽइह प्रवोचत् कुतऽआजाता कुतऽइयं विसृष्टिः |
अर्वाग्देवाऽअस्य विसर्जनेनाथाको वेद यतऽआबभूव ||६||

but, after all, who knows and who can say
whence it all came, and how creation happened?
the gods are themselves later than creation,
so who knows truly whence it all arisen?


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इयं विसृष्टिर्यतऽआबभूव यदि वा दधे यदि वा न |
योऽअस्याध्यक्षः परमे व्योमन्तसो ऽअंग वेद यदि व ना वेद ||७||

whence all creation had its origin,
he, whether he fashioned it, or whether he did not,
he, who surveys it all from the highest heaven,
he knows- or may be even he does not know.

सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है व अकर्ता
ऊँचे आकाश मे रहता सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच मे जानता या नही भी जानता
है किसी को नही पता नही पता नही है पता

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सृष्टि से पहले सत्य नहीं था असत्य भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ किस ने ढका था
उस पल तो अगम अटल जल भी कहाँ था

सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है व अकर्ता
ऊँचे आकाश मे रहता सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच मे जानता या नही भी जानता
है किसी को नही पता नही पता नही है पता

वह था हिरण्यगर्भसृष्टि से पहले विद्यमान
वही तो था रे भूतजात का स्वामी महान
जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर
ऍसे किस देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर

जिस के बल पर तेजोमय है अंबर
पृथ्वी हरी भरी सात स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर
ऍसे किस देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर

गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगाध्देवोकाहेकमेव प्राण बन कर
ऍसे किस देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर

ओ सृष्टि निर्माता स्वर्ग रचयेता पूर्वज रक्षा कर
सतयधर्मपालक अतुल जलधि आहक रक्षा कर
फैली हैं दिशाऍं बाहु जैसि सब में सब पर
ऍसे ही देवता कि उपासना करें हम अभि दे कर